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फैजुल करीम ने कहा,अगर राष्ट्रीय चुनाव जीतकर सरकार बनी तो ‘इस्लामिक मूवमेंट बांग्लादेश’ देश में शरीयत कानून लागू करेगा

ढाका  बांग्लादेश की कट्टरपंथी इस्लामी संगठन जमात-चर मोंई के प्रमुख पिर मुफ्ती सैयद मुहम्मद फैज़ुल करीम ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वह देश में तालिबान शासित अफगानिस्तान की तर्ज पर शरीयत कानून लागू करेंगे। अमेरिका स्थित बंग्ला मीडिया संस्था 'ठिकाना न्यूज' के संपादक खालिद मुहीउद्दीन को दिए गए इंटरव्यू में फैजुल करीम ने कहा, “अगर राष्ट्रीय चुनाव जीतकर सरकार बनी तो 'इस्लामिक मूवमेंट बांग्लादेश' देश में शरीयत कानून लागू करेगा।” फैजुल करीम ने अफगानिस्तान के वर्तमान शासन प्रणाली की सराहना करते हुए कहा, "हम अफगानिस्तान की शासन प्रणाली को अपनाएंगे। तालिबान सरकार ने जो अच्छा किया है, उसे लागू करेंगे।" उन्होंने यह भी कहा कि यदि सत्ता में आए तो हिंदुओं समेत सभी अल्पसंख्यकों को शरीयत के तहत अधिकार दिए जाएंगे। फैजुल करीम ने यह भी कहा कि अमेरिका, ब्रिटेन और रूस जैसे देशों की कुछ अच्छी बातें होंगी तो उन्हें भी अपनाया जाएगा। हालांकि उन्होंने यह कहा कि वे शरीयत के विरोध में नहीं हों। जमात-चर मोंई जैसे संगठनों का खुलेआम चुनाव लड़ने और शरीयत लागू करने की बातें करना यह दर्शाता है कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के दौरान इस्लामी कट्टरपंथी संगठन राजनीतिक रूप से सक्रिय हो रहे हैं। बांग्लादेश में हाल ही में सत्ता परिवर्तन हुआ है, जहां पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को छात्रों के आंदोलन के बाद अपदस्थ किया गया था और नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनाई गई है। हालांकि करीम ने आश्वासन दिया कि अल्पसंख्यकों को शरीयत के तहत अधिकार मिलेंगे, लेकिन तालिबान जैसे शासन मॉडल के उदाहरण को देखते हुए यह बयान अल्पसंख्यकों के अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी विचारधारा देश की धर्मनिरपेक्षता, महिला अधिकारों और न्याय व्यवस्था को कमजोर कर सकती है।

राष्ट्रपति ट्रंप के टैक्स कटौती पैकेज ने अमेरिकी कांग्रेस में अपनी अंतिम बाधा पार कर ली, ‘वन बिग ब्यूटीफुल बिल’ हुआ पास

वाशिंगटन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैक्स कटौती पैकेज ने गुरुवार को अमेरिकी कांग्रेस में अपनी अंतिम बाधा पार कर ली। रिपब्लिकन बहुमत वाली प्रतिनिधि सभा ने टैक्स कटौती और व्यय विधेयक को मामूली अंतर से मंजूरी दे दी तथा इसे हस्ताक्षर करने के लिए ट्रंप के पास भेज दिया। ट्रंप द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के बाद यह विधेयक कानून बन जाएगा। यह विधेयक पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में रहा बिग ब्यूटीफुल बिल के नाम से चर्चित यह विधेयक पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में रहा है। 218-214 वोट के मामूली बहुमत से पारित यह विधेयक रिपब्लिकन राष्ट्रपति के लिए एक महत्वपूर्ण जीत है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चर्चित 'वन बिग ब्यूटीफुल बिल' गुरुवार देर रात हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से 218-214 के अंतर से पास हो गया है जो उनके दूसरे कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धि बताई जा रही है. इस विधेयक को सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से पारित होने के बाद अब राष्ट्रपति के साइन के लिए भेजा दिया गया है. वहीं, विधेयक पर मतदान के दौरान दो रिपब्लिकन सांसदों ने पार्टी लाइन से हटकर डेमोक्रेटिक पक्ष में मतदान किया. वहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने इस बिल के दोनों सदनों से पास होने पर खुशी जताई है और कहा कि मैंने लाखों परिवारों को 'डेथ टैक्स' से आजादी दिलाई है. साथ ही उन्होंने कहा कि अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस बिल से बेहतर तोहफा नहीं हो सकता.  विधेयक के पारित होने के बाद व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने संवाददाताओं को बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शुक्रवार शाम 5 बजे अपने बड़े कर छूट और व्यय कटौती विधेयक पर साइन करने की योजना बना रहे हैं. 4 जुलाई को हस्ताक्षर समारोह ऐसे वक्त में होगा, जब इस अवकाश के अवसर पर व्हाइट हाउस में पिकनिक का आयोजन किया जाएगा. 800 से ज्यादा पेज वाले इस विधेयक को पारित कराने के लिए ट्रंप को काफी मशक्कत करनी पड़ी. इस विधेयक के लिए जीओपी नेताओं को रात भर काम करना पड़ा और ट्रंप ने व्यक्तिगत रूप से पर्याप्त वोट हासिल करने के लिए होल्डआउट पर दबाव भी डाला. इस विधेयक में टैक्स कटौती, सेना का बजट, रक्षा और ऊर्जा उत्पादन के लिए बढ़े हुए खर्च, साथ ही स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों में कटौती जैसे प्रमुख प्रावधान शामिल हैं. ये बिल अवैध प्रवासियों के बड़े पैमाने पर डिपोर्टेशन के लिए खर्च बढ़ाने से भी जुड़ा है.  जबकि अन्य विपक्षी का मानना है कि इस खर्च का असर देश के स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों पर पड़ने की संभावनाएं हैं. इसी वजह से उद्योगपति एलॉन मस्क समेत एक बड़ा वर्ग इस बिल के खिलाफ है और आलोचना कर रहा है. ट्रंप प्रशासन के अनुसार, ये बिल 2017 के टैक्स कट्स एंड जॉब्स एक्ट को स्थायी रूप से लागू करने के साथ-साथ उनके चुनावी वादों को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. हालांकि, बिल के पारिस होने से कांग्रेस के अंदर मतभेद पैदा हो गया है. क्या बोले डोनाल्ड ट्रंप ट्रंप ने इस बिल के दोनों सदनों से पास होने पर खुशी जताई है. उन्होंने कहा कि जैसा कि मैंने वादा किया था, हम ट्रंप कर कटौती को स्थायी बना रहे हैं. अब टिप्स, ओवरटाइम और सामाजिक सुरक्षा पर कोई टैक्स नहीं होगा… आयोवा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये विधेयक 2 मिलियन से अधिक पारिवारिक फार्मों को तथाकथित एस्टेट टैक्स, या डेथ टैक्स से आजादी दिलाता है. ट्रंप ने ये भी कहा कि अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वन बिग ब्यूटीफुल बिल से बेहतर तोहफा नहीं हो सकता. इस बिल के साथ 2024 में आयोवा के लोगों से किया गया मेरा हर बड़ा वादा पूरा हो गया.   जेडी वेंस ने जताई खुशी विधेयक के पारित होने पर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने खुशी जताई है और सभी को बधाई दी. उन्होंने एक्स पर लिखा, 'सभी को बधाई. कभी-कभी मुझे शक होता था कि 4 जुलाई तक हम इसे पूरा कर लेगें!' उन्होंने आगे लिखा, 'लेकिन अब हमने सीमा का सुरक्षित करने के लिए बड़े-बड़े टैक्स कट और जरूरी संसाधन दिए हैं.' 'निराशाजनक है बिल का पारित होना' यूनाइटेड फूड एंड कमर्शियल वर्कर्स इंटरनेशनल यूनियन के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष मिल्टन जोन्स ने कहा कि यह निराशाजनक है कि कांग्रेस ने इस नुकसानदायक, बदसूरत विधेयक को पारित कर दिया है जो कामकाजी परिवारों की जरूरतों को नजरअंदाज करता है और ऐसी कटौतियां करता है जो न केवल क्रूर हैं, बल्कि आर्थिक रूप से लापरवाहीपूर्ण हैं.

ज्यादातर पश्चिमी देशों में बुर्का पर प्रतिबंध लगाया, अब कजाकिस्तान ने किया बैन

कजाकिस्तान कजाकिस्तान की सरकार ने बुर्का और हिजाब पहनने पर बैन लगा दिया है. महिलाएं और लड़कियां सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे को पूरी तरह ढकने वाले ऐसे कपड़े अब नहीं पहन सकेंगी. कजाकिस्तान सरकार के इस फैसले से लोग आश्चर्य में पड़ सकते हैं, क्योंकि यह एक मुस्लिम बाहुल्य आबादी वाला देश है. हालांकि, कजाकिस्तान ही नहीं, कई दूसरे मुस्लिम देश भी बुर्का पर प्रतिबंध लगा चुके हैं. आइए जान लेते हैं कि बुर्का की परंपरा किस मुस्लिम देश से शुरू हुई और कहां इसको लेकर विवाद है? कहां-कहां इसे बैन किया जा चुका है? मिडिल ईस्ट के देश कजाकिस्तान में बुर्का और हिजाब पहनने पर राष्ट्रपति कासिम जोमार्ट टोकायेव ने पाबंदी लगाई है. कजाकिस्तान में करीब 70 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है. इसके बावजूद वहां बुर्का बैन किया गया है. इस देश में मुस्लिमों के बाद सबसे ज्यादा संख्या ईसाइयों की है. वहां 25 फीसदी ईसाई, चार फीसदी बौद्ध, यहूदी, बहाई और हिन्दू धर्म के लोग रहते हैं. कजाकिस्तान के एक से दो फीसदी नागरिक ऐसे हैं, जो खुद को नास्तिक मानते हैं. अरबी का शब्द है बुर्का बुर्का एक अरबी शब्द है, जिसका इस्तेमाल सातवीं शताब्दी से होता आया है. वास्तव में बुर्का शब्द का इस्तेमाल जानवरों को सर्दी से बचाने के लिए पूरी तरह से ढंकने वाले एक कवर या महिलाओं के शॉल के लिए किया जाता था. माना जाता है कि पहली बार बुर्का पर्शिया (ईरान) में पहना गया था. इस क्षेत्र में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के साथ ही फारसी संस्कृति भी इस्लामी संस्कृति में समाहित हो गई. जानकार बताते हैं कि इस्लामिक धार्मिक पुस्तकों में बुर्का शब्द के स्थान पर हिजाब का इस्तेमाल किया गया है, जिसका मतलब है पर्दा या पर्दे की क्रिया. समय के साथ फारस के मुसलमानों ने बुर्का को इस्लामी संस्कृति के रूप में अपना लिया. बुर्का किसी भी व्यक्ति को सिर से पैरों तक ढक लेता है. इसमें हाथों और देखने के लिए ही खुली जगह छोड़ी जाती है. आमतौर पर इसे हल्के कपड़ों से बनाया जाता है और काला या फिर नीला होता है. घर में परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में बुर्का पहनने की जरूरत नहीं होती है. हालांकि, बुर्का ढीला-ढाला ही होता है. यह टाइट फिटिंग का नहीं हो सकता. अरब में भी शुरू में नहीं थी पर्दा प्रथा बुर्का को लेकर अलग-अलग देशों में अलग-अलग समय पर विवाद होता रहता है. ज्यादातर पश्चिमी देशों में इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. भारत में भी कई बार शिक्षा संस्थानों और अन्य स्थलों पर बुर्का पर प्रतिबंध लगाने को लेकर विवाद हो चुका है. मीडिया रिपोर्ट्स में जाने-माने इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब के हवाले से कहा गया है कि इस्लाम में पर्दे का चलन तो था पर इससे पहले यूनानी सभ्यता में भी पर्दादारी का ऐतिहासिक प्रमाण मिला है. इरफान हबीब की मानें तो शुरू में अरब में महिलाओं को स्वतंत्रता थी और वहां की सभ्यता में पर्दा था ही नहीं. पर्दा प्रथा वास्तव में पैगंबर मोहम्मद साहब के समय में शुरू हुई. कई मुस्लिम देश लगा चुके हैं प्रतिबंध बुर्का पर प्रतिबंध लगाने वाला कजाकिस्तान कोई पहला मुस्लिम देश नहीं है. दुनिया के कई मुस्लिम देशों में बुर्का और हिजाब आदि पर पाबंदी है. इन देशों में अल्जीरिया, तुनिशिया तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और चाड जैसे मुस्लिम देशों के नाम शामिल हैं. तो इसके अलावा यूरोप के बहुत से देशों में बुर्का और हिजाब को लेकर विवाद होता रहा है. इसके बाद कई देशों में सख्त कानून तक बनाकर इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. यूरोप में सबसे पहले फ्रांस ने लगाया प्रतिबंध यूरोप का पहला देश फ्रांस था, जिसने सार्वजनिक जगहों पर बुर्का पहनने को पूरी तरह से बैन किया था. सबसे पहले साल 2004 में फ्रांस के सरकारी स्कूलों में छात्रों के किसी भी तरह के धार्मिक प्रतीक पर रोक लगाई गई थी. फिर अप्रैल 2011 में फ्रांस की सरकार ने पूरे चेहरे को ढकने वाले नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया था. फ्रांस में इस प्रतिबंध का उल्लंघन करने पर 150 यूरो का जुर्माना है. वहीं, अगर कोई अन्य व्यक्ति किसी महिला को चेहरा ढंकने के लिए मजबूर करता है, तो उस पर 30,000 यूरो का जुर्माना लगाया जाता है. वहीं, स्विटजरलैंड मार्च 2021 में सार्वजनिक स्थालों पर सिर पर दुपट्टा पहनने पर प्रतिबंध लगा चुका है. इस प्रतिबंध में मुस्लिम महिलाओं का बुर्का और नकाब’ भी शामिल है. इसके लिए वहां के संविधान में बाकायदा संशोधन किया जा चुका है. वहीं, कनाडा के एक राज्य क्यूबेक में अधिकारिक पदों पर बैठे सरकारी कर्मचारियों के धार्मिक प्रतीक पहनने पर प्रतिबंध है. इन देशों में विवाद के बावजूद बैन साल 2011 में बेल्जियम ने सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का अथवा नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगाया था. इसको लेकर मामला कोर्ट तक पहुंचा पर साल 2017 में यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय ने बेल्जियम के प्रतिबंध को सही ठहराया. अब बेल्जियम में इसका उल्लंघन करने पर जुर्माना अथवा सात दिनों की जेल हो सकती है. वहीं, डेनमार्क में अगस्त 2018 में बुर्का पर पहली बार प्रतिबंध लगाया गया था. इसके बाद विवाद शुरू हो गया और सैकड़ों लोगों ने कोपेनहेगन में मार्च और प्रदर्शन किया था. हालांकि, डेनमार्क का कानून इस प्रतिबंध को तोड़ने पर जुर्माना तक लगाता है. श्रीलंका में 29 अप्रैल 2021 को नया कानून लागू कर सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार के घूंघट पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. साल 2017 में जर्मनी और ऑस्ट्रिया की संसद भी कानून बनाकर ऐसे कपड़ों पर प्रतिबंध लगा चुकी हैं. हालांकि, जर्मनी में यह प्रतिबंध केवल न्यायाधीशों, सिविल सेवकों और सैनिकों के लिए है. वहीं, साल 2017 में ही चीन भी बुर्का और घूंघट के साथ ही लंबी दाढ़ी पर भी प्रतिबंध लगा चुका है.

मोदी सरकार ने वायुसेना को अपग्रेड करने पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला किया

नई दिल्ली Su-30MKI Super-30 Project: पिछले 20-25 साल में डिफेंस सेक्‍टर में आमूलचूल बदलाव आए हैं. टेक्‍नोलॉजी में डेवलपमेंट के चलते कन्‍वेंशनल वॉरफेयर का महत्‍व धीरे-धीरे म हुआ है. मॉडर्न एज में एयरफोर्स और नेवी का रोल काफी अहम हो चुका है. इसके साथ ही ड्रोन पर भी काफी ध्‍यान दिया जा रहा है. रूस-यूक्रेन और इजरायल-ईरान के बीच हुए युद्ध में इसका नजारा देखने को मिला है. कहीं भी आर्मी का व्‍यापक पैमाने पर इस्‍तेमाल नहीं किया गया. एयरफोर्स की भूमिका काफी अहम रही. एरियल स्‍ट्राइक से दुश्‍मनों को काफी नुकसान पहुंचाया गया. पहलगाम अटैक के बाद भारत की ओर से लॉन्‍च ऑपरेशन सिंदूर में भी आर्मी का सीमित इस्‍तेमाल हुआ. एयरफोर्स के साथ ही मिसाइल ऑपरेशंस की ही मुख्‍य भूमिका रही. ड्रोन भी एक अहम फैक्‍टर के तौर पर उभरा है. मॉडर्न वॉरफेयर में अब ड्रोन को नजरअंदाज करना संभव नहीं है. बदलते माहौल में हर देश के लिए जरूरी हो गया है कि वे अपने आर्म्‍ड फोर्सेज को अल्‍ट्रा मॉडर्न तकनीक से लैस करे. जो देश इस दिशा में इन्‍वेस्‍टमेंट करने में कतरा रहे हैं, वे लगातार पिछड़ते जा रहे हैं. रूस-यूक्रेन और इजरायल-ईरान की जंग ने हर देश को अपने डिफेंस सिस्‍टम को ज्‍यादा से ज्‍यादा मजबूत करने पर मजबूर कर दिया है. आधुनिक हथियार खरीदने की होड़ सी लग गई है. बदले माहौल में भारत भी पीछे नहीं रह सकता है. भारत लगातार अपने आर्म्‍ड फोर्सेज को मजबूत करने की दिशा में कदम उठा रहा है. आर्मी, नेवी और एयरफोर्स को मॉडर्न वेपन से लैस करने पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं. फाइटर जेट से लेकर आर्टिलरी गन, एयर डिफेंस सिस्‍टम, मिसाइल सिस्‍टम, एयरक्राफ्ट कैरियर, वॉरशिप आदि पर हजारों करोड़ का निवेश किया जा रहा है. फाइटर जेट को अपग्रेड करने पर भारत का मुख्‍य फोकस है. भारत में लगातार एयरफोर्स के फाइटर जेट स्‍क्‍वाड्रन को बढ़ाने की बात कही जा रही है. मौजूदा समय में 41 से 42 स्‍क्‍वाड्रन फाइटर जेट की जरूरत है, पर मौजूद महज 31 से 32 स्‍क्‍वाड्रन ही है. ऐसे में इंडियन एयरफोर्स के पास तकरीबन 10 स्‍क्‍वाड्रन फाइटर जेट की कमी है. वायुसेना के साथ ही डिफेंस एक्‍सपर्ट्स की ओर से भी लगातार इसपर गंभीर चिंताएं जताई जाती रही हैं. भारत सरकार और डिफेंस मिनिस्‍ट्री भी इसको लेकर गंभीर हुआ है. खासकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद अब इसमें किसी तरह की कोताही बरतने की गुंजाइश न के बराबर बची है. स्‍वदेशी फाइटर जेट के साथ ही पांचवीं पीढ़ी के उन्‍नत लड़ाकू विमान खरीदने पर भी विचार किया जा रहा है हिन्‍दुस्‍तान एयरोनॉटिक्‍स लिमिटेड ने मल्‍टीरोल तेजस फाइटर जेट के उत्‍पादन को रफ्तार दी है. इस साल के अंत से इसकी डिलिवरी शुरू होने की उम्‍मीद जताई जा रही है. दरअसल, सुरक्षा के लिहाज से भारत की स्थिति काफी यूनीक है. एक तरफ पाकिस्‍तान है जो आतंकवाद को स्‍टेट पॉलिसी की तरह इस्‍तेमाल करता आ रहा है. वहीं, दूसरी तरफ चीन है जो अपनी विस्‍तारवादी नीतियों को लगातार हवा दे रहा है. साथ ही सीमाई इलाकों में फौज के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को लगातार बढ़ा रहा है. ऐसे में भारत के लिए आर्म्‍ड फोर्सेज को सशक्‍त बनाना अनिवार्य हो गया है. भारत ने इस दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है. इंडियन एयरफोर्स फ्लीट की रीढ़ Su-30MKI फाइटर जेट को अपग्रेड के लिए मास्‍टरप्‍लान तैयार किया गया है. इसे सुपर-30 का नाम दिया गया है. रूस के सहयोग से Su-30MKI को अपग्रेड करने का प्रोजेक्‍ट लॉन्‍च किया गया है. सुपर-30 प्रोजेक्‍ट Su-30MKI 4.5 जेनरेशन का फाइटर जेट है. भारत ने इसे रूस से आयात किया है. समय के अनुसार इसमें अब बदलाव की जरूरत महसूस की जाने लगी है, ताकि इसे आज के जमाने के अनुरूप बनाया जा सके. शुरुआत में 84 Su-30MKI फाइटर जेट को अपग्रेड करने की प्‍लानिंग है, जिसमें 3 से 4 साल तक का वक्‍त लग सकता है. इसे सुपर-30 प्रोग्राम का नाम दिया गया है. ‘इंडिया डिफेंस न्‍यूज’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रोजेक्‍ट पर 2.4 से 7.8 बिलियन डॉलर (66829 करोड़ रुपये) का खर्च आने की संभावना है. अपग्रेडेशन के बाद Su-30MKI फाइटर जेट साल 2055 तक सेवा देने के योग्‍य हो जाएगा. इस अवधि में भारत का देसी फाइटर जेट प्रोजेक्‍ट भी अपने मुकाम तक पहुंच जाएगा और देश पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान अपने घर में ही बनाने में सक्षम हो जाएगा. बता दें कि डीआरडीओ और एचएएल 5th जेनरेशन का फाइटर जेट बनाने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है. इसके लिए एडवांस्‍ड मीडियन कॉम्‍बेट एयरक्राफ्ट (Advanced Medium Combat Aircraft – AMCA) प्रोजेक्‍ट लॉन्‍च किया है. अगले दस साल में भारत में पांचवीं पीढ़ी का विमान बनने की संभावना जताई गई है. Su-30MKI और होगा घातक Su-30MKI फाइटर जेट को अपग्रेड कर उसे और घातक और प्रभावी बनाने की प्‍लानिंग है. सुपर-30 प्रोग्राम के तहत Su-30MKI लड़ाकू विमान में गैलियम नाइट्राइड बेस्‍ड एक्टिव इलेक्‍ट्रॉनिकली स्‍कैन्‍ड ऐरे रडार (AESA) को इंटीग्रेट करने की योजना है. इसे विरुपाक्ष रडार के नाम से भी जानते हैं, जिसे डीआरडीओ ने डेवलप किया है. इसके माध्‍यम से 300-400 किलोमीटर दूर स्थित टारगेट को डिटेक्‍ट किया जा सकता है. युद्ध के समय में यह काफी कारगर सिद्ध होगा. इसके अलावा Su-30MKI के कॉकपिट को पुरी तरह से डिजिटल बनाया जाएगा. साथ ही 300 किलोमीटर दूर से ही दुश्‍मनों को तबाह करने वाली देसी एयर-टू-एयर मिसाइल को भी इसमें फिट किया जाएगा. अस्‍त्र MK-2 और अस्‍त्र MK-3 गांडीव जैसी मिसाइलों को Su-30MKI में इंटीग्रेट करने की योजना है. F-16 जैसे फाइटर जेट की होगी छुट्टी Su-30MKI फाइटर जेट को अपग्रेड करने के बाद पाकिस्‍तान की हालत जहां और भी खराब हो जाएगी तो वहीं चीन भी किसी तरह का दुस्‍साहस करने की कोशिश नहीं करेगा. दरअसल, साल 2019 में बालाकोट एयर स्‍ट्राइक के दौरान Su-30MKI को पाकिस्‍तानी F-16 लड़ाकू विमान से मुकाबला करने में दिक्‍कतों का सामना करना पड़ा था. Su-30MKI के पायलट को खासतौर पर रडार लिमिटेशन की वजह से संघर्ष करना पड़ा था. ऐसे में Su-30MKI को अपग्रेड करने से एफ-16 जैसे फाइटर जेट की छुट्टी होनी तय है. दूसरी तरफ, भारत नेक्‍स्‍ट जेनरेशन फाइटर जेट बनाने की दिशा में भी व्‍यापक पैमाने पर निवेश कर रहा है.  

पुतिन के लिए तानाशाह किम जोंग का बड़ा फैसला, 30000 अतिरिक्त सैनिक भेजेगा उत्तर कोरिया

मॉस्को  यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझे रूस को उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने बड़ी मदद भेजने का फैसला किया है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर कोरिया ने पुतिन की खातिर लड़ने के लिए 30,000 अतिरिक्त सैनिक भेजेगा। सीएनएन ने यूक्रेनी खुफिया दस्तावेजों के हवाले से बताया है कि ये सैनिक नवम्बर तक रूस पहुंच सकते हैं। इन्हें रूसी टुकड़ी को मजबूती देने के लिए भेजा जा रहा है, जिसमें बड़े पैमाने पर आक्रामक सैन्य अभियान भी शामिल हैं। इसक साथ ही सैटेलाइट से हासिल तस्वीरों में रूस की तैयारियों के संकेत मिले हैं। सैटेलाइट तस्वीरों में उत्तर कोरियाई तैनाती के लिए पहले इस्तेमाल किए गए जहाजों को रूसी बंदरगाहों में देखा गया और कार्गो विमानों के उड़ान पैटर्न से पता चला कि सैनिकों को रूस लाने वाले मार्ग सक्रिय थे। उत्तर कोरिया ने पिछले साल 11,000 सैनिकों को रूस की तरफ से लड़के लिए भेजा था। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अप्रैल में उनकी मौजूदगी की पुष्टि की थी। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिकी ने यूक्रेन को वायु रक्षा मिसाइलों की खेप रोकने का फैसला किया है। रूस और यूक्रेन में शांति वार्ता रूस और यूक्रेन लंबी लड़ाई के बाद अब शांति की दिशा में कदम उठा रहे हैं। दो दौर की बातचीत लगभग सफल रही और अब क्रेमलिन को उम्मीद है कि रूस-यूक्रेन वार्ता के तीसरे दौर की तारीख जल्द तय हो सकती है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि हमें उम्मीद है कि इस पर जल्द ही सहमति बन जाएगी। उन्होंने दोहराया कि वार्ता का कार्यक्रम दोनों पक्षों की सहमति से ही तय किया जा सकता है। पेस्कोव ने स्पष्ट किया कि अभी तक कोई निश्चित तारीख तय नहीं हुई है और यह प्रक्रिया आपसी सहमति पर आधारित है। उन्होंने कहा, 'यह एक पारस्परिक प्रक्रिया है।' क्रेमलिन के प्रवक्ता के मुताबिक, अगली वार्ता प्रक्रिया की गति कीव शासन और अमेरिका के मध्यस्थता करने के प्रयासों पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा, 'जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और उसे ध्यान में रखना जरूरी है।' रूस से पंगा क्यों ले रहा अजरबैजान? रूस और अजरबैजान के बीच हाल के दिनों में तनाव तेजी से बढ़ा है। ये दोनों देश कभी सोवियत संघ का हिस्सा थे और लंबे समय तक एक-दूसरे के करीबी सहयोगी रहे, लेकिन अब एक गंभीर राजनयिक विवाद में उलझ गए हैं। इस तनाव की शुरुआत कुछ खास घटनाओं से हुई, जिन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को गहरी चोट पहुंचाई है। अजरबैजान के बारे में बता दें कि इस देश के भारत के भी रिश्ते कुछ खास नहीं हैं। अजरबैजान खुलकर भारत के दुश्मन देश यानी पाकिस्तान का समर्थन करता है। आइए, समझते हैं कि ये तनाव क्यों और कैसे बढ़ा, और इसके पीछे की वजहें क्या हैं। कैसे हुई तनाव की शुरुआत? ये हैं प्रमुख वजहें- 1. येकातेरिनबर्ग में अजरबैजानी नागरिकों की मौत 27 जून को रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में रूसी पुलिस ने अजरबैजानी मूल के लोगों के खिलाफ एक बड़ी छापेमारी की। यह छापेमारी 2000 के दशक की कुछ हत्याओं की जांच के लिए थी, जिनमें अजरबैजानी अपराधी गिरोहों का हाथ माना जा रहा था। इस दौरान दो अजरबैजानी भाई, हुसेन और जियाद्दिन सफारोव की हिरासत में मौत हो गई। अजरबैजान का दावा है कि इन दोनों को रूसी पुलिस ने क्रूरता से पीटा और यातना दी, जिससे उनकी मौत हुई। वहीं, रूस का कहना है कि एक की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई, और दूसरी मौत की जांच चल रही है। अजरबैजान ने इसे "जानबूझकर हत्या" और "यातना" करार दिया, जिसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव भड़क उठा। 2. अजरबैजान का जवाबी कदम: रूसी पत्रकारों की गिरफ्तारी इस घटना के जवाब में, अजरबैजान ने बाकू में रूसी सरकार द्वारा संचालित मीडिया आउटलेट "स्पूतनिक अजरबैजान" के दफ्तर पर छापा मारा। इस छापेमारी में स्पूतनिक के दो वरिष्ठ पत्रकारों, इगोर कार्ताविख और येवगेनी बेलौसोव सहित सात रूसी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया। उन पर धोखाधड़ी, अवैध व्यापार और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे आरोप लगाए गए। इसके अलावा, लगभग 15 अन्य रूसी नागरिकों को ड्रग तस्करी और साइबर अपराध के आरोप में हिरासत में लिया गया। रूस ने इन गिरफ्तारियों को "अनुचित" और "प्रतिशोधी" बताया, जिससे विवाद और गहरा हो गया। इसके साथ ही आठ रूसी आईटी विशेषज्ञों को भी नशीली दवाओं और साइबर अपराध के आरोप में पकड़ा गया, जिनके चेहरे पर गंभीर चोटों के निशान देखे गए। इन तस्वीरों ने रूस में आक्रोश फैला दिया। रूस ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए अजरबैजान के राजदूत को तलब किया और इसे “संबंधों को कमजोर करने की सोची-समझी कोशिश” करार दिया। जवाब में अजरबैजान ने भी रूसी राजदूत को तलब किया और येकातेरिनबर्ग की घटनाओं की निष्पक्ष जांच, दोषियों की सजा और पीड़ितों के लिए मुआवजे की मांग दोहराई। 3. प्लेन क्रैश का पुराना विवाद तनाव की एक और बड़ी वजह दिसंबर 2024 में हुआ एक हवाई जहाज हादसा है। अजरबैजान एयरलाइंस का एक यात्री विमान, जिसमें 67 लोग सवार थे, रूस के ग्रोज्नी शहर के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस हादसे में 38 लोगों की मौत हो गई। अजरबैजान का दावा है कि रूसी हवाई रक्षा प्रणाली ने गलती से इस विमान पर हमला किया। अजरबैजानी मीडिया ने हाल ही में कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी कीं, जिनमें कथित तौर पर रूसी सैन्य अधिकारियों को विमान पर गोली चलाने का आदेश देते सुना गया। रूस ने इस हादसे की जिम्मेदारी लेने से इनकार किया है और उस पर घटना को दबाने का आरोप लगा है। अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से औपचारिक माफी की मांग की है, जिसे रूस ने ठुकरा दिया। 4. रूसी स्कूलों पर प्रतिबंध और सांस्कृतिक कदम अजरबैजान ने रूस के खिलाफ अपने गुस्से को जाहिर करने के लिए और भी कदम उठाए। उसने देश में रूसी भाषा के स्कूलों को धीरे-धीरे बंद करने की घोषणा की। अजरबैजान में करीब 340 रूसी भाषा के स्कूल हैं, जिनमें 1.5 लाख से ज्यादा छात्र पढ़ते हैं। इसके अलावा, अजरबैजान ने रूस से जुड़े सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया और रूसी संसद के साथ नियोजित बैठकों को भी स्थगित कर … Read more

नीति आयोग की रिपोर्ट: 2040 तक केमिकल इंडस्ट्री में दिखेगा 1 ट्रिलियन डॉलर का धमाका

नई दिल्ली नीति आयोग की एक रिपोर्ट में गुरुवार को कहा गया कि लक्षित सुधारों से 2040 तक भारत का केमिकल सेक्टर 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा और वैश्विक मूल्य श्रृंखला (जीवीसी) में 12 प्रतिशत की हिस्सेदारी हासिल कर लेगा। वर्तमान में वैश्विक केमिकल मूल्य श्रृंखलाओं में भारत की हिस्सेदारी 3.5 प्रतिशत है और 2023 में देश का केमिकल व्यापार घाटा 31 बिलियन डॉलर था। इसकी वजह आयातित फीडस्टॉक और विशेष केमिकल पर उच्च निर्भरता होना है। नीति आयोग ने रिपोर्ट में कहा कि 2030 के लिए विजन यह है कि भारत वैश्विक केमिकल मूल्य श्रृंखला में 5-6 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ वैश्विक केमिकल मैन्युफैक्चरिंग में महाशक्ति बन जाए। नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्मण्यम ने कहा कि केमिकल सेक्टर देश के कई पारंपरिक उद्योगों से कहीं बड़ा है और इसका लाभ उठाने का यही समय है। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, "हम केमिकल के एक प्रमुख उत्पादक हैं। यह एक तेजी से बढ़ता हुआ सेक्टर है। जैविक और अजैविक दोनों प्रकार के केमिकल हमारे जीवन का अहम हिस्सा हैं। हम कुछ भी करते हैं तो यह उसमें मौजूद होते हैं" इस सेक्टर का लक्ष्य अपने वर्तमान उत्पादन स्तर को दोगुना करना और 2023 में व्यापार घाटे को 31 बिलियन डॉलर से काफी कम करके केमिकलों में नेट जीरो व्यापार संतुलन तक पहुंचना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस पहल से 35-40 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त निर्यात होगा, जिससे लगभग 7 लाख नौकरियां पैदा होंगी। केमिकल सेक्टर की रणनीतिक अहमियत पर जोर देते हुए नीति आयोग के वरिष्ठ अधिकारी डॉ अरविंद विरमानी ने कहा कि इस सेक्टर के लिए एक राष्ट्रीय नीति की जरूरत है, क्योंकि हथियार निर्माण से लेकर एक्सपोर्ट क्लस्टर तक की जिम्मेदारी राज्यों की नहीं, बल्कि केंद्र की होती है। उन्होंने आगे कहा कि भारत में जो भी बड़े केमिकल क्लस्टर हैं, वे अधिकतर तटीय राज्यों में स्थापित हैं, क्योंकि पेट्रोकेमिकल्स और उससे जुड़ी वैल्यू चेन आमतौर पर समुद्री बंदरगाहों के नजदीक बेहतर काम करती है। इन क्लस्टर्स की मदद से रॉ मैटीरियल की कॉस्ट कम होती है और लॉजिस्टिक्स कुशल बनती है। इस कारण सात से आठ बड़े कोस्टल क्लस्टर्स की पहचान की गई है। इन प्रयासों से भारत न केवल अपने घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देगा, बल्कि केमिकल एक्सपोर्ट के क्षेत्र में भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती से उतर सकेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, राजकोषीय और गैर-राजकोषीय हस्तक्षेपों की एक व्यापक श्रेणी के लक्षित सुधारों से भारत का केमिकल सेक्टर 2040 तक 1 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

शगुन परिहार का एलान: पाकिस्तान से आए हर आतंकी का होगा खात्मा, सेना तैयार

किश्तवाड़ जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में जारी एनकाउंटर के बारे में बात करते हुए भारतीय जनता पार्टी की विधायक शगुन परिहार ने गुरुवार को देश की सेना पर भरोसा जताते हुए कहा कि जल्द ही आतंकवादियों का खात्मा कर दिया जाएगा। किश्तवाड़ से भाजपा विधायक शगुन परिहार ने एक बयान में कहा, "किश्तवाड़ एक खुशहाल क्षेत्र है, लेकिन फिलहाल यहां एनकाउंटर चल रहा है। यह दुखद है कि हमारे बीच अब भी आतंकवादी मौजूद हैं।" उन्होंने कहा कि जल्द से जल्द इन आतंकवादियों का खात्मा होगा। विधायक ने कहा कि जितने भी "पाकिस्तान के भेड़िए" छिपे हैं, उन्हें मारा जाएगा। हमारी सेना इसके लिए सक्षम है। इन आतंकवादियों का जल्द से जल्द खात्मा होगा।" आतंकवाद के खात्मे के लिए विकास की मांग करते हुए शगुन परिहार ने कहा, "सरकार से मांग है कि किश्तवाड़ के जितने भी दूर-दराज के इलाके हैं, वहां तक सड़कें पहुंचाई जाएं, जिससे वहां पनपने वाले आतंकवादियों का खात्मा हो सके। हमारे ग्रामीण क्षेत्रों का भी विकास हो सके।" स्थानीय विधायक ने आतंकवादियों के प्रति हमदर्दी रखने वालों पर भी बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा, "जो लोग चाहते हैं कि किश्तवाड़ में आतंकवाद फिर से बढ़े, उन्हें बता देना चाहती हूं कि यहां आतंकवाद खत्म हो चुका है। ये सिर्फ पाकिस्तान से आए हुए भेड़िए मौजूद हैं, जिन्हें खत्म करने में हमारी फौज सक्षम है।" किश्तवाड़ जिले के चटरू इलाके में दो दिन से मुठभेड़ चल रही है। यहां दो-तीन आतंकवादियों के छिपे होने की आशंका है। गुरुवार को भी रुक-रुककर सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच गोलीबारी हुई है। इलाके में आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना के आधार पर बुधवार को सुरक्षाबलों ने तलाशी अभियान शुरू किया था। भारतीय सेना ने पुष्टि करते हुए कहा कि एक संयुक्त तलाशी अभियान चलाया गया, जिसमें आतंकवादियों तक पहुंचने में सफलता मिली और फिर मुठभेड़ हो गई। फिलहाल सुरक्षाबलों की तरफ से आतंकवादियों के खात्मे के लिए ऑपरेशन जारी है।

12 राज्यों में मौसम बिगड़ा, MP में भारी बारिश का दौर जारी – जानें अपने इलाके का हाल

नई दिल्ली मानसून पूरे देश में अपने पांव पसार चुका है। यह बारिश कहां आफत तो कहां राहत बनकर हो रही है। उत्तराखंड समेत कुछ राज्यों में भारी बारिश से जहां बाढ़ की स्थिति बन गई है वहीं, एमपी के अधिकतर इलाकों में भी लोग मूसलाधार बारिश के कहर से परेशान है। ऐसे में आइए जानते है कि चार जुलाई को किन राज्यों में बारिश की कैसी स्थिति रहने के अनुमान लगाए गए है… स्काईमेटवेदर के अनुसार, अगले 24 घंटे के दौरान राजस्थान के पूर्वी क्षेत्र, गुजरात के कुछ हिस्सों, कोंकण और गोवा और कर्नाटक के तटीय इलाकों में भारी बारिश होने के अनुमान है। वहीं, एमपी, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पूर्वोत्तर भारत, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और झारखंड में बारिश देखने को मिलेगी। वहीं, कुछ जगहों पर भारी बारिश भी हो सकती है। वहीं, जिन जगहों पर हल्की से मध्यम की संभावना है उनमें बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य महाराष्ट्र, केरल तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह शामिल है। पंजाब के पश्चिमी क्षेत्र, हरियाणा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, आंतरिक कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में हल्की बारिश की आशंका जताई गई है।

अगले सात दिनों में भारी से बहुत भारी वर्षा तथा कुछ स्थानों पर अत्यधिक भारी वर्षा होने की संभावना: मौसम विभाग

नई दिल्ली  भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अगले सात दिनों में कर्नाटक में व्यापक पैमाने पर वर्षा होने का अनुमान जताया है और कई जिलों में ‘‘भारी से बहुत भारी वर्षा'' तथा कुछ स्थानों पर ‘‘अत्यधिक भारी वर्षा'' होने की संभावना जतायी है। आईएमडी ने एक बयान में कहा कि मौसम का यह रुख मध्य और पूर्वी भारत से गुजर रही मानसून ट्रफ और महाराष्ट्र-कर्नाटक तट पर अपतटीय ट्रफ से प्रभावित हो रहा है। ‘मानसून ट्रफ' उत्तर-पश्चिम भारत से बंगाल की खाड़ी तक फैला एक निम्न दबाव क्षेत्र है। दैनिक मौसम रिपोर्ट के अनुसार, बृहस्पतिवार को दक्षिण कन्नड़, उत्तर कन्नड़ और उडुपी के तटीय जिलों में 30-40 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलने के साथ ‘‘भारी से बहुत भारी बारिश'' होने की संभावना है, जबकि कुछ स्थानों पर ‘‘अत्यधिक भारी बारिश'' हो सकती है। बयान में कहा गया है कि अगले दो दिनों तक तट पर ऐसी ही स्थिति बनी रहने की उम्मीद है और उसके बाद धीरे-धीरे इसकी तीव्रता कम हो जाएगी। हालांकि, हल्की से मध्यम बारिश जारी रहने की संभावना है। उत्तरी कर्नाटक के अंदरुनी क्षेत्रों में बेलगावी जिले में तीन और चार जुलाई को 40-50 किमी प्रति घंटे की गति की हवा चलने के साथ ‘‘भारी से बहुत भारी बारिश'' होने की संभावना है। धारवाड़ में भी ‘‘भारी वर्षा'' होने की संभावना है। पूर्वानुमान अवधि के दौरान बीदर, बागलकोट, गडग, ​​हावेरी, कलबुर्गी, कोप्पल, रायचूर, विजयपुरा और यादगीर में तेज हवाओं के साथ हल्की से मध्यम बारिश होने की संभावना है। दक्षिणी कर्नाटक के अंदरुनी हिस्सों में, तीन और चार जुलाई को चिकमगलुरु, हसन, शिवमोग्गा और कोडागु में ‘‘भारी से बहुत भारी वर्षा'' होने की संभावना है, जबकि तीन जुलाई को कुछ स्थानों पर ‘‘अत्यधिक भारी वर्षा'' का अनुमान है। बल्लारी, बेंगलुरु शहरी, बेंगलुरु ग्रामीण, चामराजनगर, चिक्कबल्लापुरा, चित्रदुर्ग, दावणगेरे, कोलार, मांड्या, मैसूर, रामनगर, तुमकुरु और विजयनगर सहित अन्य जिलों में अधिकांश दिनों में 40-50 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलने के साथ ‘‘हल्की से मध्यम बारिश'' होने की संभावना है। सात जुलाई से राज्य के अधिकांश हिस्सों में वर्षा की तीव्रता कम होने की उम्मीद है। हालांकि, कई जिलों में तेज हवाओं के साथ ‘‘हल्की से मध्यम बारिश'' कम से कम नौ जुलाई तक जारी रह सकती है। बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों में अगले 48 घंटों में आमतौर पर बादल छाए रहने तथा हल्की से मध्यम बारिश होने का पूर्वानुमान है। बेंगलुरू स्थित मौसम विज्ञान केंद्र ने निवासियों, खासकर बाढ़ और भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों में रहने वालों को सतर्क रहने और स्थानीय परामर्शों का पालन करने की सलाह दी है। बेंगलुरू स्थित मौसम विज्ञान केंद्र के प्रमुख एन पुवियारसन ने कहा कि विभाग स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहा है और नियमित अपडेट जारी करेगा।  

कौन संभालेगा बीजेपी की कमान? अध्यक्ष पद के लिए 4 बड़े नाम रेस में

नई दिल्ली  बीजेपी में नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। लंबे इंतजार के बाद अब जल्द ही पार्टी के शीर्ष पद के लिए नया चेहरा चुना जा सकता है। कयास हैं कि मानसून सत्र शुरू होने से पहले यानी 21 जुलाई से पहले भाजपा के नए अध्यक्ष का नाम सार्वजनिक कर दिया जाएगा। यह चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि यह पहली बार हुआ है जब किसी अध्यक्ष के कार्यकाल के खत्म होने के बाद इतना लंबा वक्त गुजरा और फिर भी नया अध्यक्ष नहीं चुना गया। बीजेपी में अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाने वाले जेपी नड्डा का कार्यकाल जून 2024 में समाप्त हो चुका है, लेकिन वे अभी भी एक्सटेंशन पर हैं। नड्डा के अलावा पार्टी के अंदर कई दावेदार अपनी दावेदारी मजबूत करते दिख रहे हैं, जबकि संगठन ने लगभग सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं। नए अध्यक्ष के सामने हैं बड़ी चुनौतियां नए अध्यक्ष के लिए जिम्मेदारियां बहुत बड़ी होंगी। आने वाले वर्षों में भाजपा के सामने कई महत्वपूर्ण चुनाव हैं — 2025 में बिहार विधानसभा, 2026 में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम के चुनाव, और 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा समेत कई राज्यों के चुनाव, साथ ही राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव भी। पार्टी को इन सभी चुनावों में जीत सुनिश्चित करनी होगी, जो नए अध्यक्ष की ताकत और नेतृत्व कौशल की कसौटी होगी। कौन हैं दावेदार? सत्ता की दौड़ में सबसे आगे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम है। शिवराज की पार्टी में अच्छी पकड़ मानी जाती है, वे OBC समुदाय से आते हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ भी उनके मजबूत संबंध हैं। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में पार्टी की जीत के पीछे अहम भूमिका निभाने वाले सुनील बंसल का नाम भी प्रमुख है। ओडिशा के केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान भी नए अध्यक्ष बनने के दावेदार हैं। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और मोदी कैबिनेट के मंत्री मनोहर लाल खट्टर भी संगठन में अपनी मजबूती के कारण चर्चा में हैं। दक्षिण भारत से भी पार्टी ने कई नामों को तरजीह दी है। तमिलनाडु की वानति श्रीनिवासन, तमिलिसाई सौंदर्यराजन, और आंध्र प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री डी. पुरंदेश्वरी जैसे नेता इस पद के लिए चर्चित हैं। दक्षिणी राज्यों में भाजपा की पकड़ मजबूत करने के लिए यह रणनीति अहम मानी जा रही है।   चुनाव प्रक्रिया और नियम बीजेपी के संविधान के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए उम्मीदवार को कम से कम 15 वर्षों से पार्टी का सदस्य होना जरूरी है। चुनाव निर्वाचक मंडल द्वारा होता है, जिसमें राष्ट्रीय परिषद और प्रदेशों के सदस्य शामिल होते हैं। एक उम्मीदवार के नाम का प्रस्ताव कम से कम 20 निर्वाचक सदस्य कर सकते हैं।राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से पहले जिला, प्रदेश संगठन और राष्ट्रीय परिषद के चुनाव संपन्न होना जरूरी होता है। पार्टी ने पूरे देश को 36 राज्यों में बांटा है और आधे से ज्यादा राज्यों में संगठन चुनाव पूरे हो चुके हैं। इसी के आधार पर राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव तय होता है।